शुक्रवार, 24 जनवरी 2025

कुछ क्षणिकाएँ- डॉ मधु प्रधान

कुछ क्षणिकाएँ

------डॉ. मधु प्रधान

1-

 अगहन की /धूप सी 

तुम्हारी यादों की

गुनगुनी छुअन

अन्तस् भिगो जाती है

और कहीं दूर  

बहुत दूर  /ले जाती है

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तुम दूर 

रह कर भी /दूर नहीं 

भीनी -भीनी महक सी

आस -पास रहती हो

कानों में /चुपके-चुपके

कुछ कहती हो

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 आओ लौट चलें

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लौट चलें फिर 

रहें छाँह में 

मां के आँचल की

बरगद की अनुभवी 

छाँह में कुछ पल को ठहरें

भोले-भाले बनकर 

उनसे कुछ दुलार पायें

करें फ़ालतू बातें 

थोड़ा ऐंठें  बतियायें

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 कटे पँख

फिर उग आयेंगे

तुम्हें अपना आकाश

ख़ुद गढ़ना होगा

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सम्वेदनाएँ

वातावरण में नहीं 

हृदय में रहती हैं

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