रविवार, 12 अगस्त 2012

भारत माता के चरणों में शब्द पुष्पांजलि

भारत माता  के चरणों में शब्द पुष्पांजलि 



बदते चलो,कहते चलो ,जयतु मातु भारती 
जयतु मातु भारती ,  जयतु मातु भारती

 गंग- जमुन कंठ हार 
 मस्तक हिमगिरि श्रृंगार 
 सागर भी गदगद है 
 जननी के पग पखार 

दिवस रैन करते हैं ,सूर्य चन्द्र आरती 
जयतु मातु भारती  , जयतु मातु भारती

मन में भर उमंग लो 
विजय की तरंग हो 
मुस्कराती जिन्दगी में 
आत्म  -गर्व  रंग हो  

वीरता स्वयं करों में ,विजय माल धारती
जयतु मातु भारती  , जयतु मातु भारती

जोश हो विवेक युक्त 
खाइयों को पाट दो 
वारिद सा समरस हो 
नेह - नीर बाँट  दो 

शक्तिमय  उदारता ,भविष्य को संवारती 
जयतु मातु भारती  , जयतु मातु भारती

                                     ------------डॉ. मधु प्रधान 

गुरुवार, 28 जून 2012

      गीत ---------रूठ कर न जा रे बदरा 

रूठ  कर न जा रे बदरा 
रूठ  कर ............................

दरकता है हिय धरा का 
अधूरी है चिर पिपासा ,
म्लान मुख अवसाद घेरे 
आज तो ठहरो जरा सा ,

         सब्र  का ना बांध  टूटे 
         बिखर जाये  ,ये कजरा  

उमड़ते घन देख जागी 
एक नयी उम्मीद मन में 
उड़ चले  तुम ,उड़ चले क्यों 
आंज कर सपने नयन में 

         कोकिला का रुंध रहा सुर 
          पीऊ पिऊ का गीत ठहरे ,

ताल उमड़ें   , बहें झरने 
 बरसने दे अमिय धारा, 
जगे मन में प्रीत पावन
नव सरित तोड़े किनारा 

       बज उठे गीतों की पायल 
     लहर -लहरे हरित अंचरा 

                               ----  डॉ.  मधु प्रधान 
 

शनिवार, 2 जून 2012

गीत -------गंगा केवल नदी नहीं है


गंगा केवल नदी नहीं है ,
    मां   की ममता है ,
सदा सींचती आई संस्कृति 
  नव सोपान दिए 
कल कल छल छल बहती जाती 
जग का भार लिए 
इसकी पावनता की जग में 
कोई समता है ?

जटा जूट से शिव की उतरी 
थी,    निर्मलता लेकर 
किन्तु मिला क्या इसको 
जग को, जीवन का फल देकर 
अन्नपूर्णा कल्प वृक्ष  सी 
 इसमें क्षमता है ,
  
आज कह रही सुरसरि हमसे 
मन में पीर  लिए 
कौन बनेगा भागीरथ जो कलि का कलुष हरे 
मिले ज्योति से ज्योति, दीप से 
तम भी डरता है ,
              ----------डॉ. मधु प्रधान 
Madhu.pradhan.kanpur@gmail.com


दोहे


नगर बसाये तटों पर , हरियाये वन बाग़ ,
सूख रहा है  स्रोत वह ,  जाग   बावरे जाग ,

मात्र नदी गंगा नहीं ,यह  जीवन  की   धार,
शुद्ध  ह्रदय ले आत्म बल ,अब तो इसे संवार,

अगर हौसला ह्रदय में ,हो दृढ़ निश्चय स्नेह ,
रहित प्रदूषण गंग हो ,  तनिक   नहीं   संदेह ,

निकट नगर आते हुई ,श्लथ लहरें गति मंद ,
तड़प कहे भागीरथी ,  करो   प्रदूषण    बंद ,

                       ---------डॉ. मधु प्रधान 
 
 

बुधवार, 30 मई 2012

गीत

 गीत 
आओ बैठे  नदी किनारे 
गीत पुराने फिर दोहराएँ 
          कैसे किरणों  ने पर खोले 
          कैसे सूरज तपा गगन में 
          कैसे बादल ने छाया दी 
          कैसे  सपने जगे नयन में 

सुधियाँ उन स्वर्णिम दिवसों की 
मन   के  सोये  तार   जगायें   

         जल में झुके सूर्य की आभा
          और सलोने चाँद का खिलना  
         सिंदूरी बादल के रथ का 
          लहरों पर इठला के चलना 

बिम्ब पकड़ने दौड़े  लहरें 
खुद में उलझ उलझ  रह जाएँ 

          श्वेत पांखियों की  कतार ने 
           नभ में वंदन वार  सजाये 
          प्रकृति  नटी के इन्द्र जाल में 
             ये मन ठगा ठगा रह जाये  
धीरे धीरे संध्या उतरी,
लेकर अनगिन परी कथाएं  

                 -------------डॉ. मधु प्रधान 
(सर्वाधिकार सुरक्षित ) 

गुरुवार, 24 मई 2012

छू पाओ तो  मन  को  छू लो 
             उन्मन मन नीरिल नयनों में 
             मदिर  फागुनी  धूप   खिलेगी 
              अनायास  ही  महक  उठेगा 
             मन, सपनों  में गंध घुलेगी 
भावों के  उन्मुक्त  गगन में 
डोल  सको  पंक्षी  से  डोलो 

          तन मिटटी का एक खिलौना 
           इसको  पाया  तो क्या  पाया 
            नदी  रेत की ,मृग सी  तृष्णा 
            छाया  केवल ,  छाया - छाया 

प्राणों  की  शाश्वत  वीणा  पर 
घोल सको  अमृत स्वर  घोलो 
                -------------डॉ. मधु प्रधान 

(सर्वाधिकार सुरक्षित )

बुधवार, 23 मई 2012

                         ग़ज़ल 


जहाँ  तक  नजर जाती  है ,कतारें ही कतारें हैं  
बसी ये   कौन  सी  बस्ती  , दीवारें  ही दीवारें हैं 

पल  रहे  गर्द  में  बच्चे  तरसते  रोटी कपड़े को 
मगर  कुछ   के लिए  हर  सुं , बहारें ही बहारें हैं 

घटती   जा   रही  हैं  कीमतें  बस आदमी की ही 
होती   मूल्य  वृद्धि   पर  ,अनेकों  सेमीनारें    हैं 

ये  दरिया  दूर  से कितना हसीं  लगता है ऐ यारों 
मगर,  घड़ियाल ,भंवरें हैं ,किनारों पर कगारें हैं 

फिसल जातें हैं अक्सर ,रेत के मानिंद मुट्ठी से 
जो   लम्हें  बरसों से  ,हमनें  सजाएँ  है  सवारें हैं
 
डर है  कहीं  खो  जाये  न   ये   देश   गांवों   का 
उग रहे ईंट के के जंगल ,मीनारों पर मीनारों हैं 

                                     -------------डॉ. मधु प्रधान 

                                       सर्वाधिकार सुरक्षित 

रविवार, 20 मई 2012

ग़ज़ल

अहसासों के  ये  सुर्ख  कँवल  बेच रहे हैं   
जज्बातों  के  भी  शीशमहल बेच रहे  हैं  
हसरत ने था बोया जिसे उम्मीद  ने सींचा 
टूटे    हुए  ख्वाबों  की   फसल बेच रहे हैं 
सच आसमान ओढ़ कर ज़मीं पे  सो रहा 
वो   मालामाल   हैं  जो   नक़ल बेच रहे  हैं 
शेरो -सुखन की महफ़िलें बाज़ार बन गईं 
ग़ालिब  मुआफ  करना ग़ज़ल बेच रहे हैं  
सय्यादों की बस्ती में तू गाफिल न रह "मधु "
ये  रूहों  को  भी  करके  कत्ल  बेच रहे हैं  
                                      ----डॉ. मधु प्रधान 

शुक्रवार, 11 मई 2012

 बेटियों पर कुछ दोहे 

बेटी तो  इक ऋचा   है ,यह  शक्ति  यह   मंत्र
बिन इसकी मुस्कान के ,जीवन केवल यन्त्र 

बेटी है खिलती   कली , प्राणों    का   मकरंद 
बेटी से   घर  घर लगे ,यह   जीवन   का  छंद 

संबंधों  का  सेतु   है , यह   दो  घर  की  लाज
घर  आँगन  महकाएगी , इसे  संभालो आज 

बेटा घर  का  मुकुट तो , बेटी  घर  का   नाज़ 
हर पल ख़ुशी बिखेरती ,दिल  पर करती राज़  

बेटी चिड़ियों की चहक ,मृदु  वंशी  की   तान  
सबको खुशियाँ  बांटती ,खुद से रह अनजान 
                                             (सर्वाधिकार सुरक्षित )

                                 ----------डॉ. मधु प्रधान 

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

नवगीत की पाठशाला: १. डाल डाल हरसिंगार

नवगीत की पाठशाला: १. डाल डाल हरसिंगार: डाल डाल गमक उठे जैसे हरसिंगार महका पलाश वन सुधि की बौछार कुमकुम भर मांग में रस मधुर छंद सी मतवाली देह ...

नवगीत की पाठशाला: १. डाल डाल हरसिंगार

नवगीत की पाठशाला: १. डाल डाल हरसिंगार                                                                                                                          बहुत बहुत  शुक्रिया 

मंगलवार, 20 मार्च 2012

गीत


डाल  डाल गमक  उठे  जैसे  हरसिंगार   
महका   पलाश  वन  सुधि  की  बौछार  
             कुमकुम   भर    मांग   में  
              रस    मधुर   छंद    सी 
              मतवाली   देह    हुई  
              नेह   के   निबंध  सी ,
साँस साँस समां गई फागुनी बयार
महका   पलाश  वन  सुधि  की  बौछार   
              एक  छुअन गंधमयी  
            भीगा   अंग - अंग   
           पोर पोर पुलक भरे
           अनछुई    उमंग ,

छुईमुई   प्रीतिपगी   मधुमयी    बयार 
महका   पलाश  वन  सुधि  की  बौछार   

           अस्फुट से शब्दों के
          भाव     है  अनंत 
          हरियाला  सावन   है  
           बाबरा      बसंत ,

शब्दातीत पुलकनों   का  चन्दनी   खुमार
 महका   पलाश  वन  सुधि  की  बौछार   
                  ----------
                
                                                    -------डॉ.  मधु प्रधान 
                                                        (सर्वाधिकार सुरक्षित )
ईमेल--  madhu.pradhan.kanpur @gmail.com

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

गीत ---- सजी साधों की रंगोली

कौन सा मै गीत गाऊं
जो तुम्हारा मन लुभाये

आ गए मधुमास के दिन
हास के परिहास के दिन
शीत ने चादर समेटी
फागुनी उल्लास के दिन

रात फिर सपने उकेरे
चांदनी भी गुनगुनाये

कोकिला की तान से
वातावरण रस रागमय है
स्वरों की बहती नदी की
हर लहर में एक लय है
कुछ कहे कुछ अनकहे मृदु
गीत जीवन के सुनाये

कल्पना की देहरी पर
सजी साधों की रंगोली
दूर थापें मादलों की
कह रही हैं आई होली

क्षितिज पर फिर रंग बिखरे
सगुन पांखी लौट आये

-------- डॉ मधु प्रधान