ग़ज़ल
जहाँ तक नजर जाती है ,कतारें ही कतारें हैं
बसी ये कौन सी बस्ती , दीवारें ही दीवारें हैं
पल रहे गर्द में बच्चे तरसते रोटी कपड़े को
मगर कुछ के लिए हर सुं , बहारें ही बहारें हैं
घटती जा रही हैं कीमतें बस आदमी की ही
होती मूल्य वृद्धि पर ,अनेकों सेमीनारें हैं
ये दरिया दूर से कितना हसीं लगता है ऐ यारों
मगर, घड़ियाल ,भंवरें हैं ,किनारों पर कगारें हैं
फिसल जातें हैं अक्सर ,रेत के मानिंद मुट्ठी से
जो लम्हें बरसों से ,हमनें सजाएँ है सवारें हैं
डर है कहीं खो जाये न ये देश गांवों का
उग रहे ईंट के के जंगल ,मीनारों पर मीनारों हैं
-------------डॉ. मधु प्रधान
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