शुक्रवार, 24 जनवरी 2025

कुछ क्षणिकाएँ- डॉ मधु प्रधान

कुछ क्षणिकाएँ

------डॉ. मधु प्रधान

1-

 अगहन की /धूप सी 

तुम्हारी यादों की

गुनगुनी छुअन

अन्तस् भिगो जाती है

और कहीं दूर  

बहुत दूर  /ले जाती है

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तुम दूर 

रह कर भी /दूर नहीं 

भीनी -भीनी महक सी

आस -पास रहती हो

कानों में /चुपके-चुपके

कुछ कहती हो

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 आओ लौट चलें

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लौट चलें फिर 

रहें छाँह में 

मां के आँचल की

बरगद की अनुभवी 

छाँह में कुछ पल को ठहरें

भोले-भाले बनकर 

उनसे कुछ दुलार पायें

करें फ़ालतू बातें 

थोड़ा ऐंठें  बतियायें

         ------


 कटे पँख

फिर उग आयेंगे

तुम्हें अपना आकाश

ख़ुद गढ़ना होगा

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सम्वेदनाएँ

वातावरण में नहीं 

हृदय में रहती हैं

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रविवार, 2 मार्च 2014

"नमन तुम्हे मेरे भारत " का लोकार्पण

 साहित्य परिवार के सभी साथियों को यह सूचित करते हुए हर्ष का अनुभव हो रहा है की गत दिवस दिनांक २८ फरवरी को मेरी 

राष्‍ट्रगीतों की पुस्तक "नमन तुम्हे मेरे भारत " का लोकार्पण ,हिन्दी प्रचारिणी समिति के तत्वावधान मे आयोजित कार्यक्रम मे 

उत्‍तेराखंड के गवर्नर महामहिम अज़ीज़ कुरैशी एवं पदमश्री श्री श्याम नारायण पाण्डेय के कर कमलों से, हिन्दी भवन , कानपुर में

 संपन्न हुआ









रविवार, 12 अगस्त 2012

भारत माता के चरणों में शब्द पुष्पांजलि

भारत माता  के चरणों में शब्द पुष्पांजलि 



बदते चलो,कहते चलो ,जयतु मातु भारती 
जयतु मातु भारती ,  जयतु मातु भारती

 गंग- जमुन कंठ हार 
 मस्तक हिमगिरि श्रृंगार 
 सागर भी गदगद है 
 जननी के पग पखार 

दिवस रैन करते हैं ,सूर्य चन्द्र आरती 
जयतु मातु भारती  , जयतु मातु भारती

मन में भर उमंग लो 
विजय की तरंग हो 
मुस्कराती जिन्दगी में 
आत्म  -गर्व  रंग हो  

वीरता स्वयं करों में ,विजय माल धारती
जयतु मातु भारती  , जयतु मातु भारती

जोश हो विवेक युक्त 
खाइयों को पाट दो 
वारिद सा समरस हो 
नेह - नीर बाँट  दो 

शक्तिमय  उदारता ,भविष्य को संवारती 
जयतु मातु भारती  , जयतु मातु भारती

                                     ------------डॉ. मधु प्रधान 

गुरुवार, 28 जून 2012

      गीत ---------रूठ कर न जा रे बदरा 

रूठ  कर न जा रे बदरा 
रूठ  कर ............................

दरकता है हिय धरा का 
अधूरी है चिर पिपासा ,
म्लान मुख अवसाद घेरे 
आज तो ठहरो जरा सा ,

         सब्र  का ना बांध  टूटे 
         बिखर जाये  ,ये कजरा  

उमड़ते घन देख जागी 
एक नयी उम्मीद मन में 
उड़ चले  तुम ,उड़ चले क्यों 
आंज कर सपने नयन में 

         कोकिला का रुंध रहा सुर 
          पीऊ पिऊ का गीत ठहरे ,

ताल उमड़ें   , बहें झरने 
 बरसने दे अमिय धारा, 
जगे मन में प्रीत पावन
नव सरित तोड़े किनारा 

       बज उठे गीतों की पायल 
     लहर -लहरे हरित अंचरा 

                               ----  डॉ.  मधु प्रधान 
 

शनिवार, 2 जून 2012

गीत -------गंगा केवल नदी नहीं है


गंगा केवल नदी नहीं है ,
    मां   की ममता है ,
सदा सींचती आई संस्कृति 
  नव सोपान दिए 
कल कल छल छल बहती जाती 
जग का भार लिए 
इसकी पावनता की जग में 
कोई समता है ?

जटा जूट से शिव की उतरी 
थी,    निर्मलता लेकर 
किन्तु मिला क्या इसको 
जग को, जीवन का फल देकर 
अन्नपूर्णा कल्प वृक्ष  सी 
 इसमें क्षमता है ,
  
आज कह रही सुरसरि हमसे 
मन में पीर  लिए 
कौन बनेगा भागीरथ जो कलि का कलुष हरे 
मिले ज्योति से ज्योति, दीप से 
तम भी डरता है ,
              ----------डॉ. मधु प्रधान 
Madhu.pradhan.kanpur@gmail.com