कुछ क्षणिकाएँ
------डॉ. मधु प्रधान
1-
अगहन की /धूप सी
तुम्हारी यादों की
गुनगुनी छुअन
अन्तस् भिगो जाती है
और कहीं दूर
बहुत दूर /ले जाती है
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तुम दूर
रह कर भी /दूर नहीं
भीनी -भीनी महक सी
आस -पास रहती हो
कानों में /चुपके-चुपके
कुछ कहती हो
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आओ लौट चलें
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लौट चलें फिर
रहें छाँह में
मां के आँचल की
बरगद की अनुभवी
छाँह में कुछ पल को ठहरें
भोले-भाले बनकर
उनसे कुछ दुलार पायें
करें फ़ालतू बातें
थोड़ा ऐंठें बतियायें
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कटे पँख
फिर उग आयेंगे
तुम्हें अपना आकाश
ख़ुद गढ़ना होगा
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सम्वेदनाएँ
वातावरण में नहीं
हृदय में रहती हैं
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