गंगा
केवल नदी नहीं है ,
मां की ममता है ,
सदा
सींचती आई संस्कृति
नव सोपान दिए
कल
कल छल छल बहती जाती
जग
का भार लिए
इसकी
पावनता की जग में
कोई
समता है ?
जटा
जूट से शिव की उतरी
थी,
निर्मलता लेकर
किन्तु
मिला क्या इसको
जग
को, जीवन का फल देकर
अन्नपूर्णा
कल्प वृक्ष सी
इसमें
क्षमता है ,
आज
कह रही सुरसरि हमसे
मन
में पीर लिए
कौन
बनेगा भागीरथ जो कलि का कलुष हरे
मिले
ज्योति से ज्योति, दीप से
तम
भी डरता है ,
----------डॉ. मधु प्रधान
Madhu.pradhan.kanpur@gmail.com
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