गीत
आओ बैठे नदी किनारे
गीत पुराने फिर दोहराएँ
कैसे किरणों ने पर खोले
कैसे सूरज तपा गगन में
कैसे बादल ने छाया दी
कैसे सपने जगे नयन में
सुधियाँ उन स्वर्णिम दिवसों की
मन के सोये तार जगायें
जल में झुके सूर्य की आभा
और सलोने चाँद का खिलना
सिंदूरी बादल के रथ का
लहरों पर इठला के चलना
बिम्ब पकड़ने दौड़े लहरें
खुद में उलझ उलझ रह जाएँ
श्वेत पांखियों की कतार ने
नभ में वंदन वार सजाये
प्रकृति नटी के इन्द्र जाल में
ये मन ठगा ठगा रह जाये
धीरे धीरे संध्या उतरी,
लेकर अनगिन परी कथाएं
-------------डॉ. मधु प्रधान
(सर्वाधिकार सुरक्षित )