बुधवार, 30 मई 2012

गीत

 गीत 
आओ बैठे  नदी किनारे 
गीत पुराने फिर दोहराएँ 
          कैसे किरणों  ने पर खोले 
          कैसे सूरज तपा गगन में 
          कैसे बादल ने छाया दी 
          कैसे  सपने जगे नयन में 

सुधियाँ उन स्वर्णिम दिवसों की 
मन   के  सोये  तार   जगायें   

         जल में झुके सूर्य की आभा
          और सलोने चाँद का खिलना  
         सिंदूरी बादल के रथ का 
          लहरों पर इठला के चलना 

बिम्ब पकड़ने दौड़े  लहरें 
खुद में उलझ उलझ  रह जाएँ 

          श्वेत पांखियों की  कतार ने 
           नभ में वंदन वार  सजाये 
          प्रकृति  नटी के इन्द्र जाल में 
             ये मन ठगा ठगा रह जाये  
धीरे धीरे संध्या उतरी,
लेकर अनगिन परी कथाएं  

                 -------------डॉ. मधु प्रधान 
(सर्वाधिकार सुरक्षित ) 

गुरुवार, 24 मई 2012

छू पाओ तो  मन  को  छू लो 
             उन्मन मन नीरिल नयनों में 
             मदिर  फागुनी  धूप   खिलेगी 
              अनायास  ही  महक  उठेगा 
             मन, सपनों  में गंध घुलेगी 
भावों के  उन्मुक्त  गगन में 
डोल  सको  पंक्षी  से  डोलो 

          तन मिटटी का एक खिलौना 
           इसको  पाया  तो क्या  पाया 
            नदी  रेत की ,मृग सी  तृष्णा 
            छाया  केवल ,  छाया - छाया 

प्राणों  की  शाश्वत  वीणा  पर 
घोल सको  अमृत स्वर  घोलो 
                -------------डॉ. मधु प्रधान 

(सर्वाधिकार सुरक्षित )

बुधवार, 23 मई 2012

                         ग़ज़ल 


जहाँ  तक  नजर जाती  है ,कतारें ही कतारें हैं  
बसी ये   कौन  सी  बस्ती  , दीवारें  ही दीवारें हैं 

पल  रहे  गर्द  में  बच्चे  तरसते  रोटी कपड़े को 
मगर  कुछ   के लिए  हर  सुं , बहारें ही बहारें हैं 

घटती   जा   रही  हैं  कीमतें  बस आदमी की ही 
होती   मूल्य  वृद्धि   पर  ,अनेकों  सेमीनारें    हैं 

ये  दरिया  दूर  से कितना हसीं  लगता है ऐ यारों 
मगर,  घड़ियाल ,भंवरें हैं ,किनारों पर कगारें हैं 

फिसल जातें हैं अक्सर ,रेत के मानिंद मुट्ठी से 
जो   लम्हें  बरसों से  ,हमनें  सजाएँ  है  सवारें हैं
 
डर है  कहीं  खो  जाये  न   ये   देश   गांवों   का 
उग रहे ईंट के के जंगल ,मीनारों पर मीनारों हैं 

                                     -------------डॉ. मधु प्रधान 

                                       सर्वाधिकार सुरक्षित 

रविवार, 20 मई 2012

ग़ज़ल

अहसासों के  ये  सुर्ख  कँवल  बेच रहे हैं   
जज्बातों  के  भी  शीशमहल बेच रहे  हैं  
हसरत ने था बोया जिसे उम्मीद  ने सींचा 
टूटे    हुए  ख्वाबों  की   फसल बेच रहे हैं 
सच आसमान ओढ़ कर ज़मीं पे  सो रहा 
वो   मालामाल   हैं  जो   नक़ल बेच रहे  हैं 
शेरो -सुखन की महफ़िलें बाज़ार बन गईं 
ग़ालिब  मुआफ  करना ग़ज़ल बेच रहे हैं  
सय्यादों की बस्ती में तू गाफिल न रह "मधु "
ये  रूहों  को  भी  करके  कत्ल  बेच रहे हैं  
                                      ----डॉ. मधु प्रधान 

शुक्रवार, 11 मई 2012

 बेटियों पर कुछ दोहे 

बेटी तो  इक ऋचा   है ,यह  शक्ति  यह   मंत्र
बिन इसकी मुस्कान के ,जीवन केवल यन्त्र 

बेटी है खिलती   कली , प्राणों    का   मकरंद 
बेटी से   घर  घर लगे ,यह   जीवन   का  छंद 

संबंधों  का  सेतु   है , यह   दो  घर  की  लाज
घर  आँगन  महकाएगी , इसे  संभालो आज 

बेटा घर  का  मुकुट तो , बेटी  घर  का   नाज़ 
हर पल ख़ुशी बिखेरती ,दिल  पर करती राज़  

बेटी चिड़ियों की चहक ,मृदु  वंशी  की   तान  
सबको खुशियाँ  बांटती ,खुद से रह अनजान 
                                             (सर्वाधिकार सुरक्षित )

                                 ----------डॉ. मधु प्रधान