बुधवार, 30 मई 2012

गीत

 गीत 
आओ बैठे  नदी किनारे 
गीत पुराने फिर दोहराएँ 
          कैसे किरणों  ने पर खोले 
          कैसे सूरज तपा गगन में 
          कैसे बादल ने छाया दी 
          कैसे  सपने जगे नयन में 

सुधियाँ उन स्वर्णिम दिवसों की 
मन   के  सोये  तार   जगायें   

         जल में झुके सूर्य की आभा
          और सलोने चाँद का खिलना  
         सिंदूरी बादल के रथ का 
          लहरों पर इठला के चलना 

बिम्ब पकड़ने दौड़े  लहरें 
खुद में उलझ उलझ  रह जाएँ 

          श्वेत पांखियों की  कतार ने 
           नभ में वंदन वार  सजाये 
          प्रकृति  नटी के इन्द्र जाल में 
             ये मन ठगा ठगा रह जाये  
धीरे धीरे संध्या उतरी,
लेकर अनगिन परी कथाएं  

                 -------------डॉ. मधु प्रधान 
(सर्वाधिकार सुरक्षित ) 

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