गुरुवार, 28 जून 2012

      गीत ---------रूठ कर न जा रे बदरा 

रूठ  कर न जा रे बदरा 
रूठ  कर ............................

दरकता है हिय धरा का 
अधूरी है चिर पिपासा ,
म्लान मुख अवसाद घेरे 
आज तो ठहरो जरा सा ,

         सब्र  का ना बांध  टूटे 
         बिखर जाये  ,ये कजरा  

उमड़ते घन देख जागी 
एक नयी उम्मीद मन में 
उड़ चले  तुम ,उड़ चले क्यों 
आंज कर सपने नयन में 

         कोकिला का रुंध रहा सुर 
          पीऊ पिऊ का गीत ठहरे ,

ताल उमड़ें   , बहें झरने 
 बरसने दे अमिय धारा, 
जगे मन में प्रीत पावन
नव सरित तोड़े किनारा 

       बज उठे गीतों की पायल 
     लहर -लहरे हरित अंचरा 

                               ----  डॉ.  मधु प्रधान 
 

शनिवार, 2 जून 2012

गीत -------गंगा केवल नदी नहीं है


गंगा केवल नदी नहीं है ,
    मां   की ममता है ,
सदा सींचती आई संस्कृति 
  नव सोपान दिए 
कल कल छल छल बहती जाती 
जग का भार लिए 
इसकी पावनता की जग में 
कोई समता है ?

जटा जूट से शिव की उतरी 
थी,    निर्मलता लेकर 
किन्तु मिला क्या इसको 
जग को, जीवन का फल देकर 
अन्नपूर्णा कल्प वृक्ष  सी 
 इसमें क्षमता है ,
  
आज कह रही सुरसरि हमसे 
मन में पीर  लिए 
कौन बनेगा भागीरथ जो कलि का कलुष हरे 
मिले ज्योति से ज्योति, दीप से 
तम भी डरता है ,
              ----------डॉ. मधु प्रधान 
Madhu.pradhan.kanpur@gmail.com


दोहे


नगर बसाये तटों पर , हरियाये वन बाग़ ,
सूख रहा है  स्रोत वह ,  जाग   बावरे जाग ,

मात्र नदी गंगा नहीं ,यह  जीवन  की   धार,
शुद्ध  ह्रदय ले आत्म बल ,अब तो इसे संवार,

अगर हौसला ह्रदय में ,हो दृढ़ निश्चय स्नेह ,
रहित प्रदूषण गंग हो ,  तनिक   नहीं   संदेह ,

निकट नगर आते हुई ,श्लथ लहरें गति मंद ,
तड़प कहे भागीरथी ,  करो   प्रदूषण    बंद ,

                       ---------डॉ. मधु प्रधान