गीत ---------रूठ कर न जा रे बदरा
रूठ कर न जा रे बदरा
रूठ कर ............................
दरकता है हिय धरा का
अधूरी है चिर पिपासा ,
म्लान मुख अवसाद घेरे
आज तो ठहरो जरा सा ,
सब्र का ना बांध टूटे
बिखर जाये न ,ये कजरा
उमड़ते घन देख जागी
एक नयी उम्मीद मन में
उड़ चले तुम ,उड़ चले क्यों
आंज कर सपने नयन में
कोकिला का रुंध रहा सुर
पीऊ पिऊ का गीत ठहरे ,
ताल उमड़ें , बहें झरने
बरसने दे अमिय धारा,
जगे मन में प्रीत पावन
नव सरित तोड़े किनारा
बज उठे गीतों की पायल
लहर -लहरे हरित अंचरा
---- डॉ. मधु प्रधान

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें