अहसासों के ये सुर्ख कँवल बेच रहे हैं
जज्बातों के भी शीशमहल बेच रहे हैं
हसरत ने था बोया जिसे उम्मीद ने सींचा
टूटे हुए ख्वाबों की फसल बेच रहे हैं
सच आसमान ओढ़ कर ज़मीं पे सो रहा
वो मालामाल हैं जो नक़ल बेच रहे हैं
शेरो -सुखन की महफ़िलें बाज़ार बन गईं
ग़ालिब मुआफ करना ग़ज़ल बेच रहे हैं
सय्यादों की बस्ती में तू गाफिल न रह "मधु "
ये रूहों को भी करके कत्ल बेच रहे हैं
----डॉ. मधु प्रधान
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