रविवार, 20 मई 2012

ग़ज़ल

अहसासों के  ये  सुर्ख  कँवल  बेच रहे हैं   
जज्बातों  के  भी  शीशमहल बेच रहे  हैं  
हसरत ने था बोया जिसे उम्मीद  ने सींचा 
टूटे    हुए  ख्वाबों  की   फसल बेच रहे हैं 
सच आसमान ओढ़ कर ज़मीं पे  सो रहा 
वो   मालामाल   हैं  जो   नक़ल बेच रहे  हैं 
शेरो -सुखन की महफ़िलें बाज़ार बन गईं 
ग़ालिब  मुआफ  करना ग़ज़ल बेच रहे हैं  
सय्यादों की बस्ती में तू गाफिल न रह "मधु "
ये  रूहों  को  भी  करके  कत्ल  बेच रहे हैं  
                                      ----डॉ. मधु प्रधान 

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