छू पाओ तो मन को छू लो
उन्मन मन नीरिल नयनों में
मदिर फागुनी धूप खिलेगी
अनायास ही महक उठेगा
मन, सपनों में गंध घुलेगी
भावों के उन्मुक्त गगन में
डोल सको पंक्षी से डोलो
तन मिटटी का एक खिलौना
इसको पाया तो क्या पाया
नदी रेत की ,मृग सी तृष्णा
छाया केवल , छाया - छाया
प्राणों की शाश्वत वीणा पर
घोल सको अमृत स्वर घोलो
-------------डॉ. मधु प्रधान
(सर्वाधिकार सुरक्षित )
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