डाल डाल गमक उठे जैसे हरसिंगार
महका पलाश वन सुधि की बौछार
कुमकुम भर मांग में
रस
मधुर छंद सी
मतवाली देह
हुई
नेह के निबंध सी ,
साँस साँस समां गई फागुनी बयार
महका पलाश वन सुधि की बौछार
एक छुअन गंधमयी
भीगा अंग - अंग
पोर पोर पुलक भरे
अनछुई उमंग ,
छुईमुई प्रीतिपगी मधुमयी बयार
महका पलाश वन सुधि की बौछार
अस्फुट से शब्दों के
भाव है अनंत
हरियाला सावन है
बाबरा बसंत ,
शब्दातीत पुलकनों का चन्दनी खुमार
महका पलाश वन सुधि की बौछार
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-------डॉ. मधु प्रधान
(सर्वाधिकार सुरक्षित )
ईमेल-- madhu.pradhan.kanpur @gmail.com
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