शुक्रवार, 23 मार्च 2012
मंगलवार, 20 मार्च 2012
गीत
डाल डाल गमक उठे जैसे हरसिंगार
महका पलाश वन सुधि की बौछार
कुमकुम भर मांग में
रस
मधुर छंद सी
मतवाली देह
हुई
नेह के निबंध सी ,
साँस साँस समां गई फागुनी बयार
महका पलाश वन सुधि की बौछार
एक छुअन गंधमयी
भीगा अंग - अंग
पोर पोर पुलक भरे
अनछुई उमंग ,
छुईमुई प्रीतिपगी मधुमयी बयार
महका पलाश वन सुधि की बौछार
अस्फुट से शब्दों के
भाव है अनंत
हरियाला सावन है
बाबरा बसंत ,
शब्दातीत पुलकनों का चन्दनी खुमार
महका पलाश वन सुधि की बौछार
----------
-------डॉ. मधु प्रधान
(सर्वाधिकार सुरक्षित )
ईमेल-- madhu.pradhan.kanpur @gmail.com
रविवार, 26 फ़रवरी 2012
गीत ---- सजी साधों की रंगोली
कौन सा मै गीत गाऊं
जो तुम्हारा मन लुभाये
आ गए मधुमास के दिन
हास के परिहास के दिन
शीत ने चादर समेटी
फागुनी उल्लास के दिन
रात फिर सपने उकेरे
चांदनी भी गुनगुनाये
कोकिला की तान से
वातावरण रस रागमय है
स्वरों की बहती नदी की
हर लहर में एक लय है
कुछ कहे कुछ अनकहे मृदु
गीत जीवन के सुनाये
कल्पना की देहरी पर
सजी साधों की रंगोली
दूर थापें मादलों की
कह रही हैं आई होली
क्षितिज पर फिर रंग बिखरे
सगुन पांखी लौट आये
-------- डॉ मधु प्रधान
जो तुम्हारा मन लुभाये
आ गए मधुमास के दिन
हास के परिहास के दिन
शीत ने चादर समेटी
फागुनी उल्लास के दिन
रात फिर सपने उकेरे
चांदनी भी गुनगुनाये
कोकिला की तान से
वातावरण रस रागमय है
स्वरों की बहती नदी की
हर लहर में एक लय है
कुछ कहे कुछ अनकहे मृदु
गीत जीवन के सुनाये
कल्पना की देहरी पर
सजी साधों की रंगोली
दूर थापें मादलों की
कह रही हैं आई होली
क्षितिज पर फिर रंग बिखरे
सगुन पांखी लौट आये
-------- डॉ मधु प्रधान
बुधवार, 20 अक्टूबर 2010
शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010
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