बुधवार, 23 मई 2012

                         ग़ज़ल 


जहाँ  तक  नजर जाती  है ,कतारें ही कतारें हैं  
बसी ये   कौन  सी  बस्ती  , दीवारें  ही दीवारें हैं 

पल  रहे  गर्द  में  बच्चे  तरसते  रोटी कपड़े को 
मगर  कुछ   के लिए  हर  सुं , बहारें ही बहारें हैं 

घटती   जा   रही  हैं  कीमतें  बस आदमी की ही 
होती   मूल्य  वृद्धि   पर  ,अनेकों  सेमीनारें    हैं 

ये  दरिया  दूर  से कितना हसीं  लगता है ऐ यारों 
मगर,  घड़ियाल ,भंवरें हैं ,किनारों पर कगारें हैं 

फिसल जातें हैं अक्सर ,रेत के मानिंद मुट्ठी से 
जो   लम्हें  बरसों से  ,हमनें  सजाएँ  है  सवारें हैं
 
डर है  कहीं  खो  जाये  न   ये   देश   गांवों   का 
उग रहे ईंट के के जंगल ,मीनारों पर मीनारों हैं 

                                     -------------डॉ. मधु प्रधान 

                                       सर्वाधिकार सुरक्षित 

रविवार, 20 मई 2012

ग़ज़ल

अहसासों के  ये  सुर्ख  कँवल  बेच रहे हैं   
जज्बातों  के  भी  शीशमहल बेच रहे  हैं  
हसरत ने था बोया जिसे उम्मीद  ने सींचा 
टूटे    हुए  ख्वाबों  की   फसल बेच रहे हैं 
सच आसमान ओढ़ कर ज़मीं पे  सो रहा 
वो   मालामाल   हैं  जो   नक़ल बेच रहे  हैं 
शेरो -सुखन की महफ़िलें बाज़ार बन गईं 
ग़ालिब  मुआफ  करना ग़ज़ल बेच रहे हैं  
सय्यादों की बस्ती में तू गाफिल न रह "मधु "
ये  रूहों  को  भी  करके  कत्ल  बेच रहे हैं  
                                      ----डॉ. मधु प्रधान 

शुक्रवार, 11 मई 2012

 बेटियों पर कुछ दोहे 

बेटी तो  इक ऋचा   है ,यह  शक्ति  यह   मंत्र
बिन इसकी मुस्कान के ,जीवन केवल यन्त्र 

बेटी है खिलती   कली , प्राणों    का   मकरंद 
बेटी से   घर  घर लगे ,यह   जीवन   का  छंद 

संबंधों  का  सेतु   है , यह   दो  घर  की  लाज
घर  आँगन  महकाएगी , इसे  संभालो आज 

बेटा घर  का  मुकुट तो , बेटी  घर  का   नाज़ 
हर पल ख़ुशी बिखेरती ,दिल  पर करती राज़  

बेटी चिड़ियों की चहक ,मृदु  वंशी  की   तान  
सबको खुशियाँ  बांटती ,खुद से रह अनजान 
                                             (सर्वाधिकार सुरक्षित )

                                 ----------डॉ. मधु प्रधान 

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

नवगीत की पाठशाला: १. डाल डाल हरसिंगार

नवगीत की पाठशाला: १. डाल डाल हरसिंगार: डाल डाल गमक उठे जैसे हरसिंगार महका पलाश वन सुधि की बौछार कुमकुम भर मांग में रस मधुर छंद सी मतवाली देह ...

नवगीत की पाठशाला: १. डाल डाल हरसिंगार

नवगीत की पाठशाला: १. डाल डाल हरसिंगार                                                                                                                          बहुत बहुत  शुक्रिया 

मंगलवार, 20 मार्च 2012

गीत


डाल  डाल गमक  उठे  जैसे  हरसिंगार   
महका   पलाश  वन  सुधि  की  बौछार  
             कुमकुम   भर    मांग   में  
              रस    मधुर   छंद    सी 
              मतवाली   देह    हुई  
              नेह   के   निबंध  सी ,
साँस साँस समां गई फागुनी बयार
महका   पलाश  वन  सुधि  की  बौछार   
              एक  छुअन गंधमयी  
            भीगा   अंग - अंग   
           पोर पोर पुलक भरे
           अनछुई    उमंग ,

छुईमुई   प्रीतिपगी   मधुमयी    बयार 
महका   पलाश  वन  सुधि  की  बौछार   

           अस्फुट से शब्दों के
          भाव     है  अनंत 
          हरियाला  सावन   है  
           बाबरा      बसंत ,

शब्दातीत पुलकनों   का  चन्दनी   खुमार
 महका   पलाश  वन  सुधि  की  बौछार   
                  ----------
                
                                                    -------डॉ.  मधु प्रधान 
                                                        (सर्वाधिकार सुरक्षित )
ईमेल--  madhu.pradhan.kanpur @gmail.com

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

गीत ---- सजी साधों की रंगोली

कौन सा मै गीत गाऊं
जो तुम्हारा मन लुभाये

आ गए मधुमास के दिन
हास के परिहास के दिन
शीत ने चादर समेटी
फागुनी उल्लास के दिन

रात फिर सपने उकेरे
चांदनी भी गुनगुनाये

कोकिला की तान से
वातावरण रस रागमय है
स्वरों की बहती नदी की
हर लहर में एक लय है
कुछ कहे कुछ अनकहे मृदु
गीत जीवन के सुनाये

कल्पना की देहरी पर
सजी साधों की रंगोली
दूर थापें मादलों की
कह रही हैं आई होली

क्षितिज पर फिर रंग बिखरे
सगुन पांखी लौट आये

-------- डॉ मधु प्रधान